Wednesday, June 9, 2010

बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा से साक्षात्कार





बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा से 
साक्षात्कार :  कु. प्रदीप सरां 'दर्शन'

सबसे पहले तो आप बाल साहित्य के बारे में बताएं कि यह कैसा होना चाहिए?
- बाल साहित्य बच्चों के मन के अनुकूल होना चाहिए। केवल सरल रचना ही बाल साहित्य नहीं है। 'एक स्तरीय बाल साहित्य से तात्पर्य है कि वह रोचक और मनोरंजक होने के साथ-साथ बच्चों के मन को भाए।' जरूरी नहीं है कि प्रत्येक रचना शिक्षाप्रद हो...संदेश ही दे...हां, यदि कोई रचना बच्चों को संदेश देती है तो वह रचना श्रेष्ठ यानी सोने पर सुहागा को चरितार्थ करेगी।

बच्चों के लिए आपने कविताएं, कहानियां, नाटक, एकांकी आदि अनेक विधाओं पर कलम चलाई है...लेकिन बच्चों की प्रत्येक रचना में आप चित्र अवश्य देते हैं। क्या रचनाओं के साथ चित्र देना इतना जरूरी है?
-बाल रचनाओं में चित्रों का होना बहुत जरूरी है। चित्र देखकर बच्चा उस रचना को पढऩे का, उससे जुडऩे का प्रयास करता है। चूंकि बाल साहित्य की किसी भी विधा में पहले कहने-सुनने की परम्परा थी...इसके बाद चित्र शैली आई। अपनी बात को चित्रों के माध्यम से कहा जाने लगा। शब्द बाद में आए....और पहले चित्रांकन आया। चित्रांकन के बाद अक्षर आए...लिपि आई। चंूकि अक्षर साहित्य सृजन की पहली सीढ़ी है। बच्चों को पहले चित्र, फिर अक्षर...और इसके बाद शब्द और इसी प्रक्रिया में फिर वाक्यों से जोड़ा गया।

क्या आप केवल बच्चों के लिए ही लिखते हैं?
-जी नहीं, मैं साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लिखता हंू...लेकिन मेरी मूल विधा बाल साहित्य ही है। बच्चों के लिए मैंने सभी विधाओं पर कलम चलाई है यथा कहानी, एकांकी, नाटक, कविता, संस्मरण आदि।

इनके लिए क्या कोई विशेष लेखन होता है? वैसे बच्चे तो सब तरह की रचनाएं पढ़ लेते हैं...
-जी बिल्कुल नहीं। बच्चे सब तरह की रचनाएं नहीं पढ़ते। और आज इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के जमाने में तो बच्चों को साहित्य से जोडऩा बहुत ही मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में बाल साहित्यकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। यदि कोई बच्चा कोई किताब या कोई रचना पढ़ता है तो वह केवल अपने मन की रचनाएं पढ़ता है। बच्चा यह नहीं देखता कि अमुक रचना का रचनाकार कौन है...बच्चा रचनाकार का नाम कभी नहीं देखता। बड़े लेखक की यदि कोई हल्की रचना है तो वह उसे तुरन्त नकार देगा। बस..उसे तो कोई रचना पसंद आनी चाहिए। फिर वह उस रचना को बार-बार पढ़ता है। गुनगुनाता है...गाता है...मस्ती लेता है और एक दूसरे को बताता है। बच्चों की दुनिया सपनों की दुनिया होती है। बच्चों को सपनों के माध्यम से यथार्थ की तकलीफें यदि हल होती दिखाई या बताई जाएंगी तो बच्चे अपने सपनों को सकारात्मक रूप से साकार करेंगे।
रही बात विशेष लेखन की...तो बच्चों के लिए लिखने के लिए बच्चा बनना पड़ता है और मैं तो अपने आपको बच्चा ही मानता हंू...और बच्चा बनकर ही जीना चाहता हंू। बच्चे निश्छल होते हैं...वे एक-दूसरे में कोई भेदभाव नहीं करते और लड़ते - झगड़ते हैं तो पल भर बाद ही वैसे के वैसे हो जाते हैं। लोग कहते हैं कि हम बच्चों को सिखाएं। उन्हें संस्कारित करें। लेकिन मेरा मानना है कि हम बच्चों से सीखें। हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चे झूठ बोलें। लेकिन हम खुद बहुत बार झूठ बोल जाते हैं। इस बात को बच्चा महसूस कर लेता है और धीरे-धीरे वह भी उसी रंग में रंग जाता है। आपने महसूस किया होगा कि बच्चे आंख में एक विशेष प्रकार की चमक होती है। जो उसके भीतर की जिज्ञासा को दर्शाती है। कुछ जानने की...कुछ अच्छा सीखने की। जबकि बड़ों में अनेक लोगों की आंखों में धूर्तता स्पष्ट दिखाई देती है। उसके भीतर दूसरे की कमियां जानने की भूख और मौके विशेष पर किसी को नीचा दिखाने की ललक को बहुत बार महसूस किया जा सकता है।
हम बच्चों को ईमानदार होने की नसीहत देते हैं जबकि हम खुद पग-पग पर अपनी ईमानदारी  पर प्रश्न चिन्ह लगाते चले जाते हैं। हम येन-केन-प्रकारेण अपनी जेबें भरने में लगे रहते हैं। जबकि आपने देखा होगा कि नन्हे मासूम बच्चों के कपड़ों में तो जेबें होती ही नहीं हैं। वे तो दो रूपये के गुब्बारे से भी इतने खुश हो जाते हैं मानो सारी दुनिया की खुशी उनकी झोली में आ गई हों और हम............हम बड़ी-बड़ी आवश्यकताओं को पूरी करने में  कुछ भी करने से नहीं हिचकते। हम यह नहीं देखते कि जाते समय साथ क्या लेकर जाएंगे। चंूकि कफन के भी तो जेबें नहीं होतीं। अब सोचने की बात तो ये है कि बच्चा जन्मता है तब भी कुछ नहीं लेकर नहीं आता और जीवन के अंत में जब आदमी दुनिया से विदा होता है...तब भी वह कुछ नहीं लेकर जाता....फिर भी हम अपनी कारगुजारियों से एक दूसरे को परेशान करने से नहीं चूकते। यदि सारी दुनिया बच्चों जैसी हो जाए...तो दुनिया का रूप ही बदल जाएगा। फिर सारी दुनिया रसमय और रंगीन हो जाएगी...जीने का अंदाज ही बदल जाएगा।

आप अपनी रचनाओं में अधिकांशत: किस बात पर बल देते हैं?
-सुसंस्कार पर....मैं अपनी रचनाओं में मानवता, प्रेम, दया, करुणा, सहयोग, सेवा आदि मानवीय मूल्यों पर बल देते हुए सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करने का प्रयास करता हंू। मैंने अपनी राजस्थानी बाल एकांकी कृति 'तूं कांईं बणसी?' में इन्सानियत और अध्ययन की महता पर बल दिया है वहीं अपने सपनों को साकार करने के लिए अंग्रेजी बाल नाट्य कृति 'द ड्रीम्स' में अनुशासन और अध्ययन की महता पर बल दिया है।

आपकी बाल नाट्य कृति 'द ड्रीम्स' का लोकार्पण तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम साहब ने किया था। आपकी इस रचना के प्रति उनकी क्या प्रतिक्रिया रही?
-बहुत ही बढिय़ा प्रतिक्रिया दी थी उन्होंने। चूंकि लोकार्पण से पहले उन्होंने इस कृति को पढ़ा था और 17 नवम्बर 2005 को लोकार्पण के समय उन्होंने इसकी थीम को 'एक्सीलैण्ट' कह कर मेरा उत्साहवद्र्धन किया था। इस कृति में दी गई रचना के पात्रों के नाम में भी लॉजिक है। सभी पात्रों के नाम रचना के अनुकूल और सकारात्मक दिए हैं। जैसे शिक्षक का नाम है- पी.प्रकाश....प्रकाश यानी ज्ञान का सूचक। और बच्चे सभी धर्मों के लिए हैं। जैसे- मस्तानसिंह, हनीफ, विनोद, डेविड, विकास, जागृति, सपना और आशा। इसमें मैंने शिक्षक के माध्यम से बताया है कि ए से लेकर जैड तक छब्बीस अक्षर होते हैं। जिसमें ए का 1 अंक, बी के 2, सी के 3, डी के 4, ई के 5....और इसी तरह जैड के 26....। अब डिसिप्लीन की स्पैलिंग लिखने के बाद प्रत्येक अक्षर को अंक देकर उन सबको यदि जोड़ें तो योगफल पूरे 100 अंक आता है। यानी किसी भी सफलता को पाने के लिए यदि हम अनुशासित हैं और उसी के मुताबिक मेहनत करते हैं तो हमें सफलता निश्चित रूप से मिलेगी। 


बच्चों के लिए और क्या कुछ कहना चाहेंगे आप?
-बच्चों से तो मेरा यही कहना है कि वे अध्ययनशील बनें ....अच्छी-अच्छी किताबें पढ़ें और अपने काम के प्रति ईमानदार रहें। लेकिन मैं बड़ों से निवेदन करना चाहूंगा कि वे बच्चों से बात करें। उनके पास बैठें। कुछ सुनें...कुछ सुनाएं...उनके मित्र बनें ...बाप नहीं। बच्चों से मित्रता के बाद हम स्वयं को तनावरहित महसूस करेंगे........ और फिर अपने अंतिम दिनों में हमें किसी वृद्धाश्रम को तलाशने की जरूरत नहीं होगी।

-कु. प्रदीप सरां 'दर्शन', एम.फिल. में अध्ययनरत
'बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा : व्यक्तित्व एवं कृतित्व' विषय पर शोध

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बढ़िया रहा साक्षात्कार!
बधाई हो!

PRATUL said...

..... नन्हे मासूम बच्चों के कपड़ों में तो जेबें होती ही नहीं हैं। ...... यदि सारी दुनिया बच्चों जैसी हो जाए...तो दुनिया का रूप ही बदल जाएगा। फिर सारी दुनिया रसमय और रंगीन हो जाएगी...जीने का अंदाज ही बदल जाएगा।

@ चाहते तो रहे हम बचपन से कि उम्र ठहर जाए पर वो ठहरी नहीं. किशोर हुए तो जल्दी रही कि युवा हों और अपने फैसले खुद ले सकें. बड़ों की टोका-टाकी बंद हो. आज अपने यौवन की दहलीज़ भी लांघने जा रहे हैं तो बचपन पीछे से आवाजें लगा रहा है कि मुझे भी ले चलो. इस मोह से कैसे निजात मिले?

@ आज जब टीवी शो पर माता-पिता को अपने-अपने बच्चों से युवक-युवतियों के शारीरिक भावों की उल्टियाँ करवाते देखता हूँ. तो मन भावशून्य हो जाता है. सोच नहीं पाता कि सही है या गलत. कृपया आप मार्गदर्शन करें.

एक लिंक दे रहा हूँ उसमें पूरी बात है मन की, लेकिन अंत मेन उत्तर नहीं है, जो मुझे मालूम नहीं.
http://pratul-kavyatherapy.blogspot.com/2010_05_09_archive.html

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