Tuesday, October 26, 2010

महा पुरुषों के अनमोल विचार

महापुरुषों के अनमोल विचार

=भूल करने में पाप तो है ही, परन्तु उसे छिपाने में उससे भी बड़ा पाप है।             -महात्मा गांधी

=अपनी भूल अपने ही हाथों से सुधर जाए तो यह इससे कहीं अच्छा है कि कोई दूसरा उसे सुधारे।  - प्रेमचन्द

=गलती तो हर मनुष्य कर सकता है, किन्तु उस पर दृढ़ केवल मूर्ख ही होते हैं।                             -सिरसो

=अंधा वह नहीं जिसकी आँख फूट गई है, अंधा वह जो अपने दोष ढंकता है।                -महात्मा गांधी

=जो जीना नहीं जानता है वह मरना कैसे जाने ?  -महात्मा गांधी

=नम्रता का ढोंग नहीं चलता, न सादगी का।    -महात्मा गांधी

=व्यक्ति दौलत से नहीं, ज्ञान से अमीर होता है।

=झूठ इन्सान को अंदर से खोखला बना देता है।

=संसार में सब से दयनीय कौन है? धनवान होकर भी जो कंजूस है।  -विद्यापति

=हमारे भीतर कंजूसी न हो। -ऋग्वेद

कंगले की तरह जीना और धनवान हो कर मरना महज़ पागलपन है।   - टामस मिड्लटन

=भय और खतरे ने मुझे कभी जिस के लिए संकल्पित और सहमत होने को बाध्य किया, भय और खतरे से 
दूर होने पर मैं वही कर दिखाने के लिए कटिबद्ध हंू।                                                        -मौनतेन

=कंजूस के पास जितना होता है उतना ही वह उस के लिए तरसता है जो उस के पास नहीं होता। 


=हम उतने खुश कभी नहीं होते, उतने दु:खी कभी नहीं होते, जितना अपने आपको समझ लेते हैं। 
                                                                                                            -ला रोशफूको
=कमाए बगैर धन का उपभोग करने की तरह ही खुशी दिए बगैर खुश रहने का अधिकार हमें नहीं है। 
                                                                                                             -जार्ज बरनार्ड शा
=उस खुशी से बच, जो कल तुझे काटे।                                                      -हरबर्ट


=खुशी कोई हँसने की बात नहीं है।                                             -रिचर्ड ह्वेटली

=जीवन की सबसे बड़ी खुशी यह धारणा होती है कि लोग हमें चाहते हैं, हमारे लिए चाहते हैं-या कहें, हमारे होते हुए भी चाहते हैं, अंधे ऐसी ही धारणा रखते हैं।                                          - विक्टर ह्यूगो


=लोगों की खुशी के लिए पहली जरूरत है धर्म का खात्मा।             - कार्ल माक्र्स

Friday, September 24, 2010

कड़वे प्रवचन

क्रांतिकारी मुनिश्री तरुणसागर के कड़वे प्रवचन

महिलाओं में कई खूबियों के साथ एक खामी भी है। इनको कोई बात पचती नहीं है। स्त्रियों से कोई बात छिपती नहीं है। इसलिए कहते हैं जो बात पूरे गांव में फैलानी हो, किसी एक स्त्री को बता दो। बस फिर तुम चादर तान कर सो जाओ। जब तुम सोकर उठोगे तो बात पूरे गांव में फैल चुकी होगी। इस वूमन न्यूज चैनल का सामना आज तक भी आज तक नहीं कर पाया। हाँ, बात बताते वक्त इतना जरूर कह देना कि बहन, किसी और को मत बताना। निषेध में आकर्षण होता है, मन के लिए कोई भी निषेध निमंत्रण बन जाता है।

परायों के साथ जीना जितना आसान है, घर-परिवार के साथ जीना उतना ही मुश्किल है। घर में जीने का अर्थ केवल यह नहीं कि हम ईंट-पत्थर और चूने से बने मकान में जिएं। घर के साथ जीने की पहली शर्त है कि हम अपने भीतर आत्मीयता और सहज स्नेह का विस्तार करें। जिस घर में तीन पीढिय़ां एक साथ बैठकर भोजन और भजन करते हैं, वह घर धरती पर साक्षात् स्वर्ग है। आध्यात्म का प्रारम्भ धर्म से होता है, परन्तु धर्म का प्रारम्भ घर से होता है। और घर में घरवाली नहीं तो घर घर नहं, महज मकान होता है।

Tuesday, August 24, 2010

सही आभार / कीर्ति राणा










मन को भार से मुक्त करने के लिए है तो सही आभार
हम आभार व्यक्त करना सीख लें तो मन से कई तरह के भार उतर सकते हैं। घर और स्कूल से हमें ऐसे सारे संस्कार मिलते तो हैं लेकिन हम शत-प्रतिशत पालन तो कर नहीं पाते उल्टे बड़े होने पर खिल्ली उड़ाने से भी नहीं चूकते। ईश्वरीय सत्ता को हम सहजता से स्वीकार नहीं पाते लेकिन यह आसानी से मान लेते हैं कि कोई शक्ति है तो सही। बड़ा खतरा टल जाए तो इसी अदृश्य शक्ति को याद करते हैं लेकिन चौबीस घंटे आराम से बीत जाने पर हम उस शक्ति का आभार व्यक्त करना भूल जाते हैं। पांच मिनट की इस प्रार्थना से हमारे अगले चौबीस घंटे आराम से गुजर सकते हैं।

अभी कुछ दोस्तों के साथ एक समारोह में भाग लिया। रात अधिक हो जाने के कारण आयोजकों ने सबके रुकने की व्यवस्था भी फटाफट कर दी। देर तक गप्पे लगाने के बाद सभी दोस्तों ने सोने की तैयारी करते हुए लाइट ऑफ करने के साथ ही कंबल खींचा और एक दूसरे से गुडनाइट कर ली। बाकी दोस्त तो आंखें मूंद चुके थे। कुछ के खर्राटे भी शुरू हो गए थे।

गुडनाइट कर चुका एक दोस्त फिर भी जाग रहा था, पलंग पर आंखें बंद किए बैठा था और मन ही मन कुछ बुदबुदा रहा था। पहले मैंने सोचा उससे इस संबंध में पूछ लूं। फिर ध्यान आया कि हमारी बातचीत से बाकी लोगों की नींद में खलल पड़ सकता है, लिहाजा तय किया कि सुबह बात करूं गा। सुबह नाश्ते पर फिर सारे दोस्त एक साथ मिले। मैंने उस दोस्त से पूछा रात में किसे याद कर रहा था।

उसने बताया कि बचपन से यह आदत है कि सोने से पहले बीते 24 घंटों के लिए भगवान के प्रति आभार व्यक्त करता हूं कि आपकी कृपा से आज का दिन मेरे लिए आपका दिया अनमोल उपहार साबित हुआ। इसके साथ ही अपने परिजनों, रिश्तेदारों, और उनके रिश्तेदारों तथा इन सब के चिर परिचितों की बेहतरी के लिए प्रार्थना करने के साथ ही यदि हमारे कोई दुश्मन हैं तो उनके मन में कटुता के बदले करुणा के भाव पैदा करने की कामना करता हूं। चौबीस घंटों के दौरान अंजाने में मेरे किसी कार्य, किसी बात से किसी का दिल दुखा हो तो उसके लिए क्षमा भी मांगता हूं।

जाहिर है कि कुछ दोस्तों ने उसका मजाक उड़ाया तो कुछ ने सवाल किया कि जो हमारे दुश्मन हैं उनकी  बेहतरी की कामना करना तो पागलपन है। उसने कुछ प्रश्नों के जवाब दिए, कुछ मामलों में निरुत्तर हो गया। नाश्ता खत्म होने के साथ ही चर्चा भी खत्म हो गई। साथी लोग सामान समेटने के साथ ही रवानगी की तैयार में लग गए। जिनका ईश्वर नाम की सत्ता में विश्वास नहीं है उनके लिए इस तरह की प्रार्थना पागलपन हो सकती है। जो ईश्वर में विश्वास करते हैं वे भी इसे मेरा धर्म, तेरा धर्म की नजर से देखने के साथ ही अपने तरीके से समीक्षा भी कर सकते हैं।

मुझे अपने उस मित्र की इस आदत में जो अच्छी बात लगी वह है आभार का भाव। ईश्वर किसी ने देखा नहीं, प्रकृति के रूप में मिली सौगात को भी कई लोग ईश्वरीय उपहार मानने में संकोच करते हैं। पर यह भी तो सच है कि प्रकृति की ही तरह घर, परिवार, समाज के लोग बिना किसी स्वार्थ के हमारे काम आते हैं। आपस की चर्चा में हम ऐसे मददगारों को ईश्वर के समान मानने में संकोच नहीं करते। 

ऐसे मददगारों का ही हम आभार व्यक्त करना याद नहीं रखते तो हर रात सोने से पहले उस सर्वशक्तिमान का आस्था के साथ आभार व्यक्त करना तो दूर की बात है। दोस्त से हुई चर्चा के बाद से मैंने तो सोने से पहले का अपना यह नियमित क्रम बना लिया है। बाकी लाभ मिले न मिले दिन भर के तनाव से इस पांच मिनट की प्रार्थना का इतना फायदा तो है कि नींद बड़े सुकून से आती है। 

जो हमारे काम आएं, हम यदि उनका अहसान नहीं भी उतार पाएं तो आभार तो व्यक्त कर ही सकते हैं, ऐसा करने पर हम छोटे तो नहीं होंगे लेकिन सामने वाले की नजर में बड़े जरूर हो जाएंगे। हममें आभार व्यक्त करने के संस्कार हैं तो फिर प्रकृति और उस अंजान शक्ति के प्रति श्रद्धा और आभार भाव रखने में भी हर्ज नहीं होना चाहिए। कहा भी तो है जब हम किसी के लिए प्रार्थना करते हैं तो ईश्वर उन लोगों पर अपनी कृपा करता है। 

जब हम सुखी और प्रसन्न हों तो यह कतई न मानें कि यह हमारी प्रार्थना का फल है। यह मानकर चलें कि किसी ने हमारे लिए भी प्रार्थना की है। अपशब्दों में यदि हमें आगबबूला करने की ताकत है तो आभार या प्रार्थना के भाव में मन को निर्मल, भारमुक्त करने का जादू क्यों नहीं हो सकता ? 

कीर्ति राणा , 0916063636 
पचमेल से साभार

Monday, August 9, 2010

क्षमा करना सीखें

क्षमा करना सीखेंइस प्रवृत्ति को विकसित करें|
कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता| प्रत्येक व्यक्ति की
अपनी सीमाएं और कमजोरियां होती है| हमें इस का
आभास भी नहीं होता कि प्रतिदिन हम कितनी
गलतियाँ करते हैं| हम अपनी गलतियों के लिए
क्षमायाचना करते हैं, लेकिन हम दूसरों को तुरंत माफ
नहीं करते और अपने साथियों की निंदा करते हैं|
प्रत्येक व्यक्ति अपने अच्छे और बुरे कार्यों के लिए
स्वयं उत्तरदायी है और किसी को भी दूसरे के
क्रियाकलापों में निर्णायक बनने का अधिकार नहीं है|

Thursday, July 29, 2010

कीर्ति राणा की कलम से...








अच्छा करने के लिए मुहूर्त की जरूरत नहीं

हमारे एक साथी तेज बारिश में मिठाई की दुकान से कुछ ज्यादा ही मिठाई ले रहे थे। मैंने पूछा क्या भारत बंद के कारण तैयारी कर रहे हो, पहले तो वे टाल गए,दो-तीन बार पूछने पर राज खोला कि श्रीमती का जन्मदिन है और हमने ऐसे किसी भी शुभ या स्मृति प्रसंग पर तय कर रखा है कि अपनी खुशियां उन बच्चोंके साथ भी बांटें जो बेसहारा, अनाथ हैं। बंद के कारण दुकानें नहीं खुलेंगी इसलिए एक दिन पहले ही खरीद कर रख रहा हूं।

एक अन्य मित्र भी जरूरतमंद की मदद करते हैं लेकिन, तरीका थोड़ा अलग है। पास-पड़ोस मे किसी निर्धन परिवार का बच्चा आर्थिक परेशानी के कारण आगे पढ़ाई नहीं कर पा रहा हो तो उसे कापी, किताब, फीस, स्कूली ड्रेस आदि मुहैया करा देते हैं। एक अन्य व्यक्ति अपने परिवार के बड़े छोटे सदस्यों के साफ-सुथरे और पहनने लायक कपड़े प्रेस करवा के जरूरतमंद लोगों या आश्रम में देकर आते हैं।

चाट की दुकान पर हम कुछ चटपटा खाने के लिए तो जाते हैं लेकिन टेस्ट पसंद नहीं आने पर हम बिना एक पल सोचे वह प्लेट डस्टबीन में डाल देते हैं। हमारे बच्चे पेस्ट्री की जिद करते हैं, हम लेकर भी देते हैं लेकिन बालहठ के चलते वह उसे फेंक कर कुछ और खाने के लिए मचलने लगते हैं। हम फिर उनकी नई फरमाइश पूरी करने में लग जाते हैं।

हम चाहें जिस धर्म का पालन करते हों, सभी धर्मों के पवित्र ग्रंथों में बात कहने के तरीके अलग हो सकते हैं लेकिन इन सभी का मूलभाव यह तो रहता ही है कि जो असहाय, असमर्थ हैं उनकी मदद करें। हम सब के मन में कभी-कभी सहायता का समुद्र हिलोरे भी मारने लगता हैं लेकिन समझ नहीं आता किसकी, कैसे, कितनी मदद करें। जब कि ऐसे लोगों कि कमी नहीं है जिन्हें समय पर मिली थोड़ी सी मदद भी डूबते को तिनके का सहारा साबित हो सकती है।

हम अपने पर, अपनों पर खर्च करने में तो दिखावे की सारी सीमाएं लांघ जाते हैं फिर भी कई बार वह सुकून नहीं मिलता जिसके लिए हम यह सारा प्रदर्शन करते हैं। रोते बच्चे को चुप कराने के लिए हम तमाम जतन करते हैं, तत्काल महंगा खिलौना खरीद कर उसे बहलाने की कोशिश भी करते हैं लेकिन उसकी रुलाई रुकती भी है तो कौवे-कबूतर को उड़ते, बंदर को उछलकूद करते, हमारी हंसती शक्ल देखकर या मां की गोद में प्यार की थपकी से। हमारा मन भी लगता है किसी ठुनकते बच्चे की तरह ही है कब, कैसे खुश होगा हमें ही पता नहीं होता। फिर भी हमें यह तो पता ही है कि किसी की आंख से बहते आंसू पोंछने के लिए हम रुमाल दे सकते हैं। हमें यह भी पता है कि किसी अन्य के चेहरे पर यदि हल्की सी मुस्कान देखना है तो हमें भी जोर से तो हंसना ही पड़ेगा। समस्या तो यह है कि हम हंसना मुस्कुराना भूलते जा रहे हैं। 

श्री रविशंकर जीवन जीने की कला के रहस्यों को समझाते हुए कहते हैं भले ही झूठमूठ हंसो, न हंस सको तो झूठे ही मुस्कुराओ, बदले में हमें सामने वाले की सच्ची या झूठी ही सही लेकिन मुस्कान ही मिलेगी। सही है नाराज कर हम दूसरों का दिल तोडऩे के साथ ही अपना खून भी जलाते हैं लेकिन हमारी हंसी दिलों को जोडऩे और हार्टअटैक से बचाव का काम भी कर सकती है। हम अपने गम से ही इतने दुखी हैं कि सामने वाले कि न तो खुशी पचा पाते हैं और न ही उसका दु:ख हमें विचलित करता है। 

'अपने लिए जिए तो क्या जिए, तू जी ऐ दिल जमाने के लिए' यह गीत सुनते वक्त हम गुनगुनाते जरूर हैं लेकिन इसका मर्म नहीं समझ पाते। कई बार भारी भरकम गिफ्ट पर हल्की सी मुस्कान भारी पड़ जाती हैं लेकिन हम बाकी लोगों के चेहरे की मुस्कान बढ़ाने वाले छोटे से प्रयास करने के विषय में भी नहीं सोच पाते। दूसरों के लिए हम करना तो बहुत कुछ चाहते हैं लेकिन प्रचार से दूर रहकर असहाय लोगों की सहायता करने वालों की हमारे ही आसपास भी कमी नहीं है, हम चाहें तो ऐसे लोगों सेभी कुछ अच्छा करना तो सीख ही सकते हैं।

साभार : पचमेल ब्लॉग 09816063636

Wednesday, July 21, 2010

कौन है ख़ूबसूरत ..?

  • ख़ूबसूरत बातें...
  • खूबसूरत है वो लब जिन पर दूसरों के लिए एक दुआ है

  • खूबसूरत है वो मुस्कान जो दूसरों की खुशी देख कर खिल जाए

  • खूबसूरत है वो दिल जो किसी के दुख मे शामिल हो जाए और किसी के प्यार के रंग मे रंग जाए

  • खूबसूरत है वो जज़बात जो दूसरो की भावनाओं को समझे

  • खूबसूरत है वो एहसास जिस मे प्यार की मिठास हो

  • खूबसूरत है वो बातें जिनमे शामिल हों दोस्ती और प्यार की किस्से कहानियाँ

  • खूबसूरत है वो आँखे जिनमे कितने खूबसूरत ख्वाब समा जाएँ

  • खूबसूरत है वो आसूँ जो किसी के ग़म मे बह जाएँ

  • खूबसूरत है वो हाथ जो किसी के लिए मुश्किल के वक्त सहारा बन जाए

  • खूबसूरत है वो कदम जो अमन और शान्ति का रास्ता तय कर जाएँ

  • खूबसूरत है वो सोच जिस मे पूरी दुनिया की भलाई का ख्याल आ  जाए

  • sandeep ke vichar Dula ram saharan ke orkut account se sabhaar

Sunday, July 18, 2010

सर्वोत्तम सुक्तियां

    • जो शत्रु बनाने से भय खाता है, उसे कभी सच्चे मित्र नहीं मिलेंगे। 
    • उनसे कभी मित्रता न कर, जो तुमसे बेहतर नहीं।                    
    • जीवन में एक मित्र मिल गया तो बहुत है, दो बहुत अधिक है, तीन तो मिल ही नहीं सकते।                                                                  
    • या तो हाथीवाले से मित्रता न करो, या फिर ऐसा मकान बनवाओ जहां उसका हाथी आकर खड़ा हो सके।                                                        
    • संसार में केवल मित्रता ही एक ऐसी चीज है जिसकी उपयोगिता के सम्बन्ध में दो मत नहीं है।                                                                      
    • न्याय नहीं बल्कि त्याग और केवल त्याग ही मित्रता का नियम है।                
    • प्रकृति जानवरों तक को अपने मित्र पहचानने की सूझ-बूझ दे देती है। 
    • ज्ञान मुक्त करता है, पर ज्ञान का अभिमान नरकों में ले जाता है।
    • सच्चा प्रेम दुर्लभ है, सच्ची मित्रता उससे भी दुर्लभ।                     
    • अच्छाई का अभिमान बुराई की जड़ है।
    • स्वार्थ और अभिमान का त्याग करने से साधुता आती है।
    • अपनी बुद्धि का अभिमान ही शास्त्रों की, सन्तों की बातों को अन्त: करण में टिकने नहीं देता।
    • वर्ण, आश्रम आदि की जो विशेषता है, वह दूसरों की सेवा करने के लिए है, अभिमान करने के लिए नहीं।
    • आप अपनी अच्छाई का जितना अभिमान करोगे, उतनी ही बुराई पैदा होगी। इसलिए अच्छे बनो, पर अच्छाई का अभिमान मत करो।

Tuesday, July 6, 2010

क्रांतिकारी मुनिश्री तरुणसागर : 
कड़वे प्रवचन

 किसी ने पूछा: गुरु क्यों जरूरी है? मैंने प्रति प्रश्र किया: मां क्यों जरूरी है? वे बोले- मां न हो तो हम संसार में नहीं आ सकते। मैंने कहा- गुरु न हो तो हम संसार से मुक्त नहीं हो सकते। गुरु का मतलब फैमिली डॉक्टर। गुरु मन की चिकित्सा करता है। शिष्य के लिए गुरु का द्वार किसी भी मंदिर या मस्जिद की चौखट से अधिक महत्वपूर्ण होता है। सागर तो बिना लहरों के हो सकता है, मगर लहरें बिना सागर के नहीं हो सकती। गुरु तो बिना शिष्य के हो सकता है, मगर शिष्य बिना गुरु के नहीं हो सकता।

दुनिया में जो बड़े पाप हो रहे हैं। उन्हें कौन कर रहा है? भूखे पेट का आदमी? नहीं। खाली पेट का आदमी तो पेट भरने जितना ही पाप करता है। लेकिन यह जो भरे पेट का आदमी है ना। वह पेटी और कोठी भरने जितने बड़े-बड़े पाप करता है। महावीर वाणी है- ईमानदारी से पेट भरा जा सकता है, पेटी और कोठी नहीं। समुद्र शुद्ध जल से कहां भरता है? तमाम गंदे नदी-नाले का जल जब समुद्र में गिरता है तब कहीं वह भरता है। याद रखना: आदमी पहले तो अमीर होने के लिए बड़े पाप करता है और फिर अमीर होकर अपनी अइयाशी पर पाप करता है। 

Sunday, June 27, 2010

जो नहीं मिला उसका ज्यादा दुख



जो नहीं मिला, उसका ज्यादा दुःख  / कीर्ति राणा


हम अपने घर की हालत तो सुधार नहीं पाते मगर दूसरों के अस्त-व्यस्त घरों को लेकर टीका टिप्पणी करने से नहीं चूकते। हमारा स्वभाव कुछ ऐसा हो गया है कि पड़ोसी का सुख तो हमसे देखा नहीं जाता। उसके दुख में ढाढस बंधाने के बदले सूई में नमक लगाकर उसके घावों को कुरेदने में हमेशा उतावले रहते हैं।

जब पुरानी संदूकों के ताले खोले जाते हैं तो सामान उथल-पुथल करते वक्त ढेर सारे नए खिलौने भी हाथ में आ जाते हैं। तब याद आती है कि घूमने गए थे तब ये तो बच्चों के लिए खरीदे थे। उन्हें खेलने के लिए सिर्फ इसलिए नहीं दिए कि एक बार में ही तोड़ डालेंंगे। अब खिलौने हाथ आए भी तो तब, जब उन बच्चों के भी बच्चे हो गए, और इन बच्चों के लिए लकड़ी और मिट्टी के खिलौने इस जमाने में किसी काम के नहीं हैं। उन्हें इससे भी कोई मतलब नहीं कि इन छोटे-छोटे खिलौनों में दादा-दादी का प्यार छुपा है।

अब हम इस बात से दुखी भी हों तो इन बच्चों क ो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनके लिए अपना सुख ज्यादा मायने रखता है। ऐसे में कई बुजुर्ग कलपते हुए प्रायश्चित भरे लहजे में स्वीकारते भी हैं कि उसी वक्त हमारे बच्चों को खेलने के लिए दे देते तो ज्यादा अच्छा रहता। ऐसा किया होता तो निश्चित ही उस वक्त बच्चों को खुशी मिलती पर उससे हमारा अभिभावक वाला गुरूर खत्म हो जाता, शायद इसीलिए संदूक में रखकर ताला लगाकर भूल गए।

हम सब लगभग इसी तरह के प्रसंगों का सामना करते ही हैं। हमारे बुजुर्गों की न तो ज्यादा आवश्यकताएं थीं और इससे भी महत्वपूर्ण यह कि वे हर हाल में खुश रहना और हालातों से समझौता करना जानते थे। अब ऐसा नहीं है, हमारे पास जो है उसे हम भोग नहीं पाते और जो हमेंं मिलना संभव नहीं उसे पाने के प्रयास में घनचक्कर हुए जाते हैं। पूरी जिंदगी मेें हममें से कई लोग तो यह तय ही नहीं कर पाते हैं कि उन्हें क्या करना है और इस दुनिया में उनक ी कुछ उपयोगिता भी है या नहीं। हम कभी संतुष्ट नहीं हो पाते। लिहाजा परिस्थितियों से समझौता करना नहीं समझ पाते। समझौता करना नहीं चाहते इसी कारण अपने ही हाथों अपने जीवन को असहज बना देते हैं। जो सुख हमें मिला है उसमें खुश होने की अपेक्षा हम इस चिंता में ही अपना खून जलाते रहते हैं कि सामने वाला सुखी क्यों नजर आ रहा है। दूसरे से जलन के मामले में यूं तो हम महिलाओं के स्वभाव का जिक्र तत्काल करने लगते हैं लेकिन पुरुष स्वभाव भी इस मामले में बिल्कुल महिलाओं जैसा ही है। हमें अपना पांच हजार का जूता और दस हजार का मोबाइल एक दिन बाद ही तब घटिया लगने लगता है जब हमारा पड़ोसी अपने जूते और मोबाइल का दाम हमसे ज्यादा बताता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी महिला ने भले ही दस हजार की साड़ी और पचास हजार का हार क्यों न पहन रखा हो, शादी समारोह में वह पड़ोस से गुजरी महिला के नेकलेस की फुसफुसाते हुए तारीफ इसी अंदाज में करेगी मेरे हार से उसका हार कितना अच्छा है न, मुझे भी ऐसा ही लेना था। बस कहते जरूर हैं कि हमे किसी से मतलब नहीं, अपने में मस्त रहते हैं, पर क्या वाकई हमारी कथनी और करनी में अंतर नहीँ है। हम तब ही अपने में मस्त रहते हैं जब सामने वाला मुसीबत में हो। उस वक्त हम चिंतित रहते भी हैं तो इसलिए कि कहीं वह दुखी आदमी आकर हमारे सामने अपना दुखड़ा न रोने लगे। सामने वाला रात-दिन मेहनत करके तरक्की कर भी ले तो हम उसकी यह तरक्की इसलिए नहीं पचा पाते क्योंकि उस मुकाम तक हम नहीं पहुंच पाए। हमें अपना काम तो सर्वश्रेष्ठ लगता है लेकिन दूसरे के काम में हम कमिया ही तलाशते रहतेे हैं।

हम अच्छा करना नहीं चाहते और कोई हमसे आगे निकल जाए यह हमें पसंद नहीं। हमारा बच्चा परीक्षा में अच्छे नंबरों से पिछड़ जाए तो पेपर कठिन होना, तबीयत खराब हो जाने जैसे बहानों की मदद लेने मेें जरा सी देर नहीं लगाते। उसी क्लास में पढऩे वाला पड़ोसी का बच्चा अच्छे नंबर ले आए तो हम कहने से नहीं चूकते स्कूल वालों से पहचान है। ले-देकर नंबर बढ़वा लिए होंगे। छोटी सी जिंदगी में हमें अपना घर व्यवस्थित करने की फुरसत तो मिल नहीं पाती, दूसरे के अस्तव्यस्त घर का बखान करने में ही हम वक्त जाया करते रहते हैं। हमारे पास लोगों की मदद करने के लिए भले ही टाइम नहीं हो लेकिन सूई में नमक लगाकर उनके जख्म कुरेदने का भरपूर वक्त हमारे पास है।



एज केयर के सुझाव पर आज से ही अमल
संस्था एज केयर के अध्यक्ष डा वीके शर्मा के अनुरोध पर आज से इस कालम का पाइंट साइज कुछ बड़ा किया जा रहा है। उनका सुझाव था कि इससे वरिष्ठ नागरिकों को पढऩे में अधिक आसानी हो जाएगी।

Sabhar : Pachmel by Kirti Rana, Shimla

Saturday, June 26, 2010

क्षमा दिवस


व्यक्तित्व का अद्भुत गुण है क्षमा 

क्षमा का जीवन में बहुत बड़ा महत्व है। यदि इंसान कोई गलती करे 
और उसके लिए माफी माँग ले तो सामने वाले का गुस्सा काफी हद तक
 दूर हो जाता है। जिस तरह क्षमा माँगना व्यक्तित्व का एक अच्छा गुण है
 उसी तरह किसी को क्षमा कर देना भी इंसान के व्यक्तित्व में चार चाँद
 लगाने का काम करता है। माफ करने वाले व्यक्ति की हर कोई तारीफ 
करता है और उसकी प्रसिद्धि दूर दूर तक फैल जाती है।

कवियों ने क्षमा को अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया है। 
'क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात, कहाँ रहीम हरि को
 घट्यो जो भृगु मारी लात' जैसी पंक्तियाँ यही संदेश देती हैं कि 
क्षमा करना बड़ों का दायित्व है। यदि छोटे गलती कर देते हैं 
तो इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें माफ न किया जाए।

वहीं रामधारी सिंह दिनकर ने कहा है कि क्षमा वीरों को 
ही सुहाती है। उन्होंने लिखा है ‘क्षमा शोभती उस भुजंग 
को जिसके पास गरल हो, उसका क्या जो दंतहीन विषहीन
 विनीत सरल हो।' वह लिखते हैं- 
सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है बल का दर्प चमकता 
उसके पीछे जब जगमग है।

क्षमा को सभी धर्मों और संप्रदायों में श्रेष्ठ गुण करार दिया गया है। 
जैन संप्रदाय में इसके लिए एक विशेष दिन का आयोजन किया 
जाता है। मनोविज्ञानी भी क्षमा या माफी को मानव व्यवहार का 
एक अहम हिस्सा मानते हैं। 

उनका कहना है कि यह इंसान की जिन्दगी का एक अत्यंत 
महत्वपूर्ण पहलू है। क्षमा का मनुष्य के व्यक्तित्व में बहुत 
महत्व होता है। यदि आदमी गलती कर दे और उसके लिए 
माफी नहीं माँगे तो इसका मतलब यह हुआ कि उसके 
व्यक्तित्व में अहम संबंधी विकार है। 

माफी माँगना और माफ करना दोनों ही इंसानी व्यक्तित्व 
को परिपूर्ण करने वाले तत्व हैं। लेकिन कुछ लोग जो 
जानबूझकर, बार-बार लगातार और मूर्खतावश या 
अहंकारवश गलती करते हैं, उन्हें कभी माफ नहीं करना
 चाहिए। आज के जमाने में माफ करने वाला बेवकूफ 
समझा जाता है। अगर कोई आपके व्यक्तित्व को बार-बार 
अपमानित करने की कोशिश करें तो समय यह कहता है 
कि ऐसे व्यक्ति का त्याग करना ही मुनासिब है।

Sabhar : balmuskan

असफलता अंत नहीं





अपने आप से समझौता न करें 

अच्छा जॉब पाना और उसके लिए लगातार मेहनत करना किसी प्रतियोगी
परीक्षा के लिए वह भी पूर्ण लगन के साथ। आपने लगन के साथ मेहनत
की है पर परिणाम नकारात्मक आ रहा है। आप क्या करेंगे? मेहनत
करना छोड़ देंगे या अपना लक्ष्य बदल देंगे? यह स्थिति प्रत्येक युवा
 के सामने आती है। सफलता प्राप्ति का दबाव एक असफलता के बाद जरा
 ज्यादा ही हो जाता है। व्यक्ति स्वयं से प्रश्न पूछने लगता है कि आखिर
कहाँ गड़बड़ हो गई? 

दरअसल व्यक्ति कई बार इस प्रकार की स्थिति होने पर पलायनवादी
मानसिकता अपना लेता है। वह असफलता से इतना डर जाता है कि
पुन: उस रास्ते पर जाने की वह हिम्मत नहीं जुटा पाता। वह अपने
आप से समझौता करने लगता है कि शायद पेपर ही कठिन था या
 जॉब इंटरव्यू में उससे ज्यादा काबिल लोग आए थे। इतनी मेहनत
 करना मेरे बस की बात नहीं आदि। वह अपने आपको ही तर्क देने
लगता है और मेहनत से जी चुराने के लिए प्रेरित करने लगता है।
 जबकि यही समय होता है आत्मविश्लेषण करने का, अपनी कमियों
को स्वयं के सामने रखने का और सफलता से पुन: प्रेम करने का। 




* असफलता अंत नहीं 

परीक्षा या जॉब न पाने की असफलता का मतलब अंत नहीं है।
असफलता का मतलब होता है कि बस अब आप सफलता के
 लिए तैयार हो रहे हैं। रोजाना की जिंदगी में हमें कई ऐसे
लोग मिलते हैं जिन्होंने आरंभिक रूप से असफलता पाई परंतु
समय के साथ उन्होंने तर्कों की कसौटी पर सफलता को ऊँचा
ही रखा और पुन: अपने आपको प्रेरित कर मेहनत करने
लगते हैं। वे असफलता को अपने आप पर हावी नहीं होने देते। 

* एक ही लक्ष्य 
असफलताओं से होता हुआ रास्ता ही सफलता के नजदीक
पहुँचाता है। असफलता आपको बताती है कि कहाँ गड़बड़
हो गई और अगले प्रयास में कहाँ ज्यादा मेहनत करना है।
इससे आपको अपने लक्ष्य की प्राप्ति में काफी आसानी
हो जाती है। क्योंकि लक्ष्य और भी सटीक और सामने
नजर आने लगता है ऐसा लक्ष्य जो पहले से ज्यादा नजदीक है।

लक्ष्य की निकटता आपको ‍और ‍अधिक मेहनत करने के
लिए प्रेरित करती है। 

* असफलता भी सभी के साथ बाँटें
अक्सर हम असफलता को दुनिया से छिपाते हैं। इसके परिणाम
 काफी घातक सिद्ध होते हैं। जब सफलता को हम सभी को बताना
चाहते हैं तब असफलता को छुपाने से हम स्वयं ही ऐसे विचारों
के द्वंद्व में खो जाते हैं जहाँ से केवल असफलता ही नजर आने
लगती है। असफलता मिलने का मतलब है कि आपने प्रयास
किया और क्या प्रयास करने को भी आप दुनिया के सामने
नहीं लाना चाहेंगे। 

असफलता को अपने दोस्तों और परिवार वालों के साथ बाँटें,
हो सकता है कि आपको वे ऐसी राय दें जिसके बारे में आपने
कभी कल्पना ही न की हो। इससे मन भी नकारात्मक
विचारों से हल्का हो जाएगा जिससे ताजे और सकारात्मक
विचारों के लिए आपके मन में जगह बन पाएगी और आप
पुन: सफलता के लिए अपने प्रयास तेज कर देंगे।

sabhar : balmuskan

Wednesday, June 9, 2010

बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा से साक्षात्कार





बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा से 
साक्षात्कार :  कु. प्रदीप सरां 'दर्शन'

सबसे पहले तो आप बाल साहित्य के बारे में बताएं कि यह कैसा होना चाहिए?
- बाल साहित्य बच्चों के मन के अनुकूल होना चाहिए। केवल सरल रचना ही बाल साहित्य नहीं है। 'एक स्तरीय बाल साहित्य से तात्पर्य है कि वह रोचक और मनोरंजक होने के साथ-साथ बच्चों के मन को भाए।' जरूरी नहीं है कि प्रत्येक रचना शिक्षाप्रद हो...संदेश ही दे...हां, यदि कोई रचना बच्चों को संदेश देती है तो वह रचना श्रेष्ठ यानी सोने पर सुहागा को चरितार्थ करेगी।

बच्चों के लिए आपने कविताएं, कहानियां, नाटक, एकांकी आदि अनेक विधाओं पर कलम चलाई है...लेकिन बच्चों की प्रत्येक रचना में आप चित्र अवश्य देते हैं। क्या रचनाओं के साथ चित्र देना इतना जरूरी है?
-बाल रचनाओं में चित्रों का होना बहुत जरूरी है। चित्र देखकर बच्चा उस रचना को पढऩे का, उससे जुडऩे का प्रयास करता है। चूंकि बाल साहित्य की किसी भी विधा में पहले कहने-सुनने की परम्परा थी...इसके बाद चित्र शैली आई। अपनी बात को चित्रों के माध्यम से कहा जाने लगा। शब्द बाद में आए....और पहले चित्रांकन आया। चित्रांकन के बाद अक्षर आए...लिपि आई। चंूकि अक्षर साहित्य सृजन की पहली सीढ़ी है। बच्चों को पहले चित्र, फिर अक्षर...और इसके बाद शब्द और इसी प्रक्रिया में फिर वाक्यों से जोड़ा गया।

क्या आप केवल बच्चों के लिए ही लिखते हैं?
-जी नहीं, मैं साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लिखता हंू...लेकिन मेरी मूल विधा बाल साहित्य ही है। बच्चों के लिए मैंने सभी विधाओं पर कलम चलाई है यथा कहानी, एकांकी, नाटक, कविता, संस्मरण आदि।

इनके लिए क्या कोई विशेष लेखन होता है? वैसे बच्चे तो सब तरह की रचनाएं पढ़ लेते हैं...
-जी बिल्कुल नहीं। बच्चे सब तरह की रचनाएं नहीं पढ़ते। और आज इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के जमाने में तो बच्चों को साहित्य से जोडऩा बहुत ही मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में बाल साहित्यकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। यदि कोई बच्चा कोई किताब या कोई रचना पढ़ता है तो वह केवल अपने मन की रचनाएं पढ़ता है। बच्चा यह नहीं देखता कि अमुक रचना का रचनाकार कौन है...बच्चा रचनाकार का नाम कभी नहीं देखता। बड़े लेखक की यदि कोई हल्की रचना है तो वह उसे तुरन्त नकार देगा। बस..उसे तो कोई रचना पसंद आनी चाहिए। फिर वह उस रचना को बार-बार पढ़ता है। गुनगुनाता है...गाता है...मस्ती लेता है और एक दूसरे को बताता है। बच्चों की दुनिया सपनों की दुनिया होती है। बच्चों को सपनों के माध्यम से यथार्थ की तकलीफें यदि हल होती दिखाई या बताई जाएंगी तो बच्चे अपने सपनों को सकारात्मक रूप से साकार करेंगे।
रही बात विशेष लेखन की...तो बच्चों के लिए लिखने के लिए बच्चा बनना पड़ता है और मैं तो अपने आपको बच्चा ही मानता हंू...और बच्चा बनकर ही जीना चाहता हंू। बच्चे निश्छल होते हैं...वे एक-दूसरे में कोई भेदभाव नहीं करते और लड़ते - झगड़ते हैं तो पल भर बाद ही वैसे के वैसे हो जाते हैं। लोग कहते हैं कि हम बच्चों को सिखाएं। उन्हें संस्कारित करें। लेकिन मेरा मानना है कि हम बच्चों से सीखें। हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चे झूठ बोलें। लेकिन हम खुद बहुत बार झूठ बोल जाते हैं। इस बात को बच्चा महसूस कर लेता है और धीरे-धीरे वह भी उसी रंग में रंग जाता है। आपने महसूस किया होगा कि बच्चे आंख में एक विशेष प्रकार की चमक होती है। जो उसके भीतर की जिज्ञासा को दर्शाती है। कुछ जानने की...कुछ अच्छा सीखने की। जबकि बड़ों में अनेक लोगों की आंखों में धूर्तता स्पष्ट दिखाई देती है। उसके भीतर दूसरे की कमियां जानने की भूख और मौके विशेष पर किसी को नीचा दिखाने की ललक को बहुत बार महसूस किया जा सकता है।
हम बच्चों को ईमानदार होने की नसीहत देते हैं जबकि हम खुद पग-पग पर अपनी ईमानदारी  पर प्रश्न चिन्ह लगाते चले जाते हैं। हम येन-केन-प्रकारेण अपनी जेबें भरने में लगे रहते हैं। जबकि आपने देखा होगा कि नन्हे मासूम बच्चों के कपड़ों में तो जेबें होती ही नहीं हैं। वे तो दो रूपये के गुब्बारे से भी इतने खुश हो जाते हैं मानो सारी दुनिया की खुशी उनकी झोली में आ गई हों और हम............हम बड़ी-बड़ी आवश्यकताओं को पूरी करने में  कुछ भी करने से नहीं हिचकते। हम यह नहीं देखते कि जाते समय साथ क्या लेकर जाएंगे। चंूकि कफन के भी तो जेबें नहीं होतीं। अब सोचने की बात तो ये है कि बच्चा जन्मता है तब भी कुछ नहीं लेकर नहीं आता और जीवन के अंत में जब आदमी दुनिया से विदा होता है...तब भी वह कुछ नहीं लेकर जाता....फिर भी हम अपनी कारगुजारियों से एक दूसरे को परेशान करने से नहीं चूकते। यदि सारी दुनिया बच्चों जैसी हो जाए...तो दुनिया का रूप ही बदल जाएगा। फिर सारी दुनिया रसमय और रंगीन हो जाएगी...जीने का अंदाज ही बदल जाएगा।

आप अपनी रचनाओं में अधिकांशत: किस बात पर बल देते हैं?
-सुसंस्कार पर....मैं अपनी रचनाओं में मानवता, प्रेम, दया, करुणा, सहयोग, सेवा आदि मानवीय मूल्यों पर बल देते हुए सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करने का प्रयास करता हंू। मैंने अपनी राजस्थानी बाल एकांकी कृति 'तूं कांईं बणसी?' में इन्सानियत और अध्ययन की महता पर बल दिया है वहीं अपने सपनों को साकार करने के लिए अंग्रेजी बाल नाट्य कृति 'द ड्रीम्स' में अनुशासन और अध्ययन की महता पर बल दिया है।

आपकी बाल नाट्य कृति 'द ड्रीम्स' का लोकार्पण तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम साहब ने किया था। आपकी इस रचना के प्रति उनकी क्या प्रतिक्रिया रही?
-बहुत ही बढिय़ा प्रतिक्रिया दी थी उन्होंने। चूंकि लोकार्पण से पहले उन्होंने इस कृति को पढ़ा था और 17 नवम्बर 2005 को लोकार्पण के समय उन्होंने इसकी थीम को 'एक्सीलैण्ट' कह कर मेरा उत्साहवद्र्धन किया था। इस कृति में दी गई रचना के पात्रों के नाम में भी लॉजिक है। सभी पात्रों के नाम रचना के अनुकूल और सकारात्मक दिए हैं। जैसे शिक्षक का नाम है- पी.प्रकाश....प्रकाश यानी ज्ञान का सूचक। और बच्चे सभी धर्मों के लिए हैं। जैसे- मस्तानसिंह, हनीफ, विनोद, डेविड, विकास, जागृति, सपना और आशा। इसमें मैंने शिक्षक के माध्यम से बताया है कि ए से लेकर जैड तक छब्बीस अक्षर होते हैं। जिसमें ए का 1 अंक, बी के 2, सी के 3, डी के 4, ई के 5....और इसी तरह जैड के 26....। अब डिसिप्लीन की स्पैलिंग लिखने के बाद प्रत्येक अक्षर को अंक देकर उन सबको यदि जोड़ें तो योगफल पूरे 100 अंक आता है। यानी किसी भी सफलता को पाने के लिए यदि हम अनुशासित हैं और उसी के मुताबिक मेहनत करते हैं तो हमें सफलता निश्चित रूप से मिलेगी। 


बच्चों के लिए और क्या कुछ कहना चाहेंगे आप?
-बच्चों से तो मेरा यही कहना है कि वे अध्ययनशील बनें ....अच्छी-अच्छी किताबें पढ़ें और अपने काम के प्रति ईमानदार रहें। लेकिन मैं बड़ों से निवेदन करना चाहूंगा कि वे बच्चों से बात करें। उनके पास बैठें। कुछ सुनें...कुछ सुनाएं...उनके मित्र बनें ...बाप नहीं। बच्चों से मित्रता के बाद हम स्वयं को तनावरहित महसूस करेंगे........ और फिर अपने अंतिम दिनों में हमें किसी वृद्धाश्रम को तलाशने की जरूरत नहीं होगी।

-कु. प्रदीप सरां 'दर्शन', एम.फिल. में अध्ययनरत
'बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा : व्यक्तित्व एवं कृतित्व' विषय पर शोध

Saturday, June 5, 2010

सफ़दर हाशमी की कविता - किताब







किताबें

किताबें कुछ कहना चाहती हैं
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।


किताबें करती हैं बातें
बीते ज़मानों की
दुनिया की, इंसानों की
आज की, कल की
एक-एक पल की।
ख़ुशियों की, ग़मों की
फूलों की, बमों की
जीत की, हार की
प्यार की, मार की।
क्या तुम नहीं सुनोगे
इन किताबों की बातें ?

किताबें कुछ कहना चाहती हैं।
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।
किताबों में चिड़िया चहचहाती हैं
किताबों में खेतियाँ लहलहाती हैं
किताबों में झरने गुनगुनाते हैं
परियों के किस्से सुनाते हैं
किताबों में राकेट का राज़ है
किताबों में साइंस की आवाज़ है
किताबों में कितना बड़ा संसार है
किताबों में ज्ञान की भरमार है।

क्या तुम इस संसार में
नहीं जाना चाहोगे?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।
-सफदर हाशमी

Friday, June 4, 2010

काम तो अपने ही आएंगे, पैसा नहीं../ कीर्ति राणा, शिमला


काम तो अपने ही आएंगे, पैसा नहीं

- कीर्ति राणा, शिमला

ऐसा क्यों होता है कि साया भी जब हमारा साथ छोड़ जाता है तभी हमें अपनों की कमी महसूस होती है। शायद इसीलिए कि जब ये सब हमारे साथ होते हैं तब हमें इनकी अहमियत का अहसास नहीं होता। विशेषकर राजनीति में अपने नेता के लिए रातदिन एक करने वाले तब ठगे से रह जाते हैं कि लाल बत्ती का सुख मिलते ही नेता अपने ऐसे ही सारे कार्यकर्ताओं को भूल जाता है। सुख-दु:ख के बादल उमड़ते घुमड़ते रहते हैं लेकिन छाते की तरह खुद को भिगोकर हमें बचाने वाले अपने लोगों के त्याग को हम अपने प्रभाव के आगे कुछ समझते ही नहीं। ऐसे ही कारणों से हमें बाद में पछताना भी पड़ता है।


माल रोड की ओर से आ रहे अधेड़ उम्र के एक व्यक्ति मुझ से टकरा गए। कुछ गर्मी का असर और कुछ उनकी लडख़ड़ाती चाल, मैंने ही सॉरी कहना ठीक समझा। बदले में वो ओके-ओके कहकर ठिठक गए तो मुझे भी रुकना ही पड़ा। फिर करीब पंद्रह मिनट वो अंग्रेजी-हिंदी में अपना दर्द सुनाते रहे कि दिल्ली में रह रहे पत्नी बच्चों से कई बार फोन पर कह चुका हूं शिमला आ जाओ, आजकल करते-करते छह महीने निकाल दिए। कमरा लेकर अकेले रह रहे उन सज्जन की बातों से यह भी आभास हुआ कि पति पत्नी में कुछ अनबन चल रही है। अकेलेपन की पीड़ा, बच्चों की याद और कुछ नशे के खुमार से उनकी आंखें छलछला आई। बार बार कह रहे थे पत्नी बच्चों के प्यार से प्यारा दुनिया में और कुछ नहीं, अभी वे लोग आ जाएं तो शिमला के ये गर्मी भरे दिन भी ठंडे हो जाएंगे मेरे लिए। अपना गम सुनाने के साथ ही वे ङ्क्षड्रक करने का सच स्वीकारने के साथ यह भी पूछते जा रहे थे स्मैल तो नहीं आ रही है, ज्यादा नहीं बस दो तीन पैग लिए हैं। मैंने जैसे-तैसे उनसे गुडबॉय कह कर पीछा छुड़ाया।

मैंने कई लोगों को देखा है, यूं तो फर्राटेदार हिंदी में बात करते रहते हैं लेकिन पता नहीं इस अंगूर की बेटी का क्या जादू है, इसका सुरूर चढ़ते ही अंग्रेजी में शुरू हो जाते हैं। मुझे नहीं लगता कि लोग अंग्रेजी शराब के कारण अंग्रजी बोलने लगते होंगे। दरअसल मुझे तो कुछ लोगों के साथ यह ठीक से अंगे्रजी नहीं बोल पाने की कुंठा लगती है जो थोड़ा सा नशा होने पर कुलांचे मारने लगती है। इस बहाने ही सही आदमी के मन में दबा सच और उसकी कुंठा बाहर तो आ जाती है। हल्के से नशे ने उस अधेड़ व्यक्ति के लिए तो आत्म साक्षात्कार का ही काम किया होगा वरना इतनी तीव्रता से बीवी, बच्चों से दूरी का अहसास नहीं होता।

इसके विपरीत हम अपने आसपास ऐसे लोगों को भी देखते हैं जो दौलत के नशे में चूर होने के कारण हर चीज को पैसे से ही तोलते हैं उन्हें किसी की भलाई, अपनेपन की भी परवाह नहीं होती क्योंकि ऐसे लोग उस मानसिकता के होते हैं जो यह मानकर चलते हैं हर चीज पैसे से खरीदी जा सकती है। ऐसा सोचने वाले यह भूल जाते हैं कि ऐसा भी वक्त आ सकता है जब पैसा होने के बाद भी कई बार हाथ मलते रह जाने जैसे हाल हो जाते हैं। जोर की भूख लगी हो लेकिन कुछ खाने को ही नहीं मिल पाए, किसी सुनसान रास्ते में हमारे किसी परिचित की तबीयत बिगड़ जाए और उपचार न मिल पाने के कारण जान ही चली जाए। इस तरह के हालात में तो जेब में रखे बैंकों के एटीएम, पर्स में रखे नोट भी कुछ देर तो बेकार ही रहेंगे।

सदियों से कहते और सुनते आए हैं पैसा तो हाथ का मैल है लेकिन हम है कि इस सच को समझना ही नहीं चाहते कि जब पैसा नहीं था तब हम लोगों के कितने करीब थे और जब से पैसा बरसने लगा तब से कौन लोग हमारे करीब हैं। क्यों हमें अपने लोगों की जरूरत अकेलेपन या मुसीबत में ही महसूस होती है। शायद इसीलिए की जो हमारे अपने होते हैं उन्हें हमारे पैसे कि नहीं हमारी परवाह होती है। जो अपना है वह सुख में हमसे दूरी बनाना जानता है लेकिन हम कभी मुसीबत में घिर जाए तो पल पल साथ रहने के बाद भी यह दर्शाने कि कोशिश नहीं करता कि वह हमारे साथ है। ये खुशियों की बारिश और सुख दु:ख के ये बादल शायद इसीलिए उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं कि हम अपने परायों कि पहचान करना तो सीख ही जाएं। ऐसे में भी यदि हम समझ ना पाएं तो फिर अपनों से दूर रहने पर उनकी कमी महसूस करना ही विकल्प बचता है। ऐसा बुरा वक्त जीवन में न आए इसका तरीका तो यही है कि हम पैसों से ज्यादा अपनों को महत्व दें। वरना तो चिडिय़ा खेत चुग जाएगी और हम हाथ ही मलते रह जाएंगे।

ब्लॉग : पचमेल से साभार

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