Sunday, June 27, 2010

जो नहीं मिला उसका ज्यादा दुख



जो नहीं मिला, उसका ज्यादा दुःख  / कीर्ति राणा


हम अपने घर की हालत तो सुधार नहीं पाते मगर दूसरों के अस्त-व्यस्त घरों को लेकर टीका टिप्पणी करने से नहीं चूकते। हमारा स्वभाव कुछ ऐसा हो गया है कि पड़ोसी का सुख तो हमसे देखा नहीं जाता। उसके दुख में ढाढस बंधाने के बदले सूई में नमक लगाकर उसके घावों को कुरेदने में हमेशा उतावले रहते हैं।

जब पुरानी संदूकों के ताले खोले जाते हैं तो सामान उथल-पुथल करते वक्त ढेर सारे नए खिलौने भी हाथ में आ जाते हैं। तब याद आती है कि घूमने गए थे तब ये तो बच्चों के लिए खरीदे थे। उन्हें खेलने के लिए सिर्फ इसलिए नहीं दिए कि एक बार में ही तोड़ डालेंंगे। अब खिलौने हाथ आए भी तो तब, जब उन बच्चों के भी बच्चे हो गए, और इन बच्चों के लिए लकड़ी और मिट्टी के खिलौने इस जमाने में किसी काम के नहीं हैं। उन्हें इससे भी कोई मतलब नहीं कि इन छोटे-छोटे खिलौनों में दादा-दादी का प्यार छुपा है।

अब हम इस बात से दुखी भी हों तो इन बच्चों क ो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनके लिए अपना सुख ज्यादा मायने रखता है। ऐसे में कई बुजुर्ग कलपते हुए प्रायश्चित भरे लहजे में स्वीकारते भी हैं कि उसी वक्त हमारे बच्चों को खेलने के लिए दे देते तो ज्यादा अच्छा रहता। ऐसा किया होता तो निश्चित ही उस वक्त बच्चों को खुशी मिलती पर उससे हमारा अभिभावक वाला गुरूर खत्म हो जाता, शायद इसीलिए संदूक में रखकर ताला लगाकर भूल गए।

हम सब लगभग इसी तरह के प्रसंगों का सामना करते ही हैं। हमारे बुजुर्गों की न तो ज्यादा आवश्यकताएं थीं और इससे भी महत्वपूर्ण यह कि वे हर हाल में खुश रहना और हालातों से समझौता करना जानते थे। अब ऐसा नहीं है, हमारे पास जो है उसे हम भोग नहीं पाते और जो हमेंं मिलना संभव नहीं उसे पाने के प्रयास में घनचक्कर हुए जाते हैं। पूरी जिंदगी मेें हममें से कई लोग तो यह तय ही नहीं कर पाते हैं कि उन्हें क्या करना है और इस दुनिया में उनक ी कुछ उपयोगिता भी है या नहीं। हम कभी संतुष्ट नहीं हो पाते। लिहाजा परिस्थितियों से समझौता करना नहीं समझ पाते। समझौता करना नहीं चाहते इसी कारण अपने ही हाथों अपने जीवन को असहज बना देते हैं। जो सुख हमें मिला है उसमें खुश होने की अपेक्षा हम इस चिंता में ही अपना खून जलाते रहते हैं कि सामने वाला सुखी क्यों नजर आ रहा है। दूसरे से जलन के मामले में यूं तो हम महिलाओं के स्वभाव का जिक्र तत्काल करने लगते हैं लेकिन पुरुष स्वभाव भी इस मामले में बिल्कुल महिलाओं जैसा ही है। हमें अपना पांच हजार का जूता और दस हजार का मोबाइल एक दिन बाद ही तब घटिया लगने लगता है जब हमारा पड़ोसी अपने जूते और मोबाइल का दाम हमसे ज्यादा बताता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी महिला ने भले ही दस हजार की साड़ी और पचास हजार का हार क्यों न पहन रखा हो, शादी समारोह में वह पड़ोस से गुजरी महिला के नेकलेस की फुसफुसाते हुए तारीफ इसी अंदाज में करेगी मेरे हार से उसका हार कितना अच्छा है न, मुझे भी ऐसा ही लेना था। बस कहते जरूर हैं कि हमे किसी से मतलब नहीं, अपने में मस्त रहते हैं, पर क्या वाकई हमारी कथनी और करनी में अंतर नहीँ है। हम तब ही अपने में मस्त रहते हैं जब सामने वाला मुसीबत में हो। उस वक्त हम चिंतित रहते भी हैं तो इसलिए कि कहीं वह दुखी आदमी आकर हमारे सामने अपना दुखड़ा न रोने लगे। सामने वाला रात-दिन मेहनत करके तरक्की कर भी ले तो हम उसकी यह तरक्की इसलिए नहीं पचा पाते क्योंकि उस मुकाम तक हम नहीं पहुंच पाए। हमें अपना काम तो सर्वश्रेष्ठ लगता है लेकिन दूसरे के काम में हम कमिया ही तलाशते रहतेे हैं।

हम अच्छा करना नहीं चाहते और कोई हमसे आगे निकल जाए यह हमें पसंद नहीं। हमारा बच्चा परीक्षा में अच्छे नंबरों से पिछड़ जाए तो पेपर कठिन होना, तबीयत खराब हो जाने जैसे बहानों की मदद लेने मेें जरा सी देर नहीं लगाते। उसी क्लास में पढऩे वाला पड़ोसी का बच्चा अच्छे नंबर ले आए तो हम कहने से नहीं चूकते स्कूल वालों से पहचान है। ले-देकर नंबर बढ़वा लिए होंगे। छोटी सी जिंदगी में हमें अपना घर व्यवस्थित करने की फुरसत तो मिल नहीं पाती, दूसरे के अस्तव्यस्त घर का बखान करने में ही हम वक्त जाया करते रहते हैं। हमारे पास लोगों की मदद करने के लिए भले ही टाइम नहीं हो लेकिन सूई में नमक लगाकर उनके जख्म कुरेदने का भरपूर वक्त हमारे पास है।



एज केयर के सुझाव पर आज से ही अमल
संस्था एज केयर के अध्यक्ष डा वीके शर्मा के अनुरोध पर आज से इस कालम का पाइंट साइज कुछ बड़ा किया जा रहा है। उनका सुझाव था कि इससे वरिष्ठ नागरिकों को पढऩे में अधिक आसानी हो जाएगी।

Sabhar : Pachmel by Kirti Rana, Shimla

1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

उपयोगी और सार्थक लेखन!
बधाई!

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