Monday, August 9, 2010

क्षमा करना सीखें

क्षमा करना सीखेंइस प्रवृत्ति को विकसित करें|
कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता| प्रत्येक व्यक्ति की
अपनी सीमाएं और कमजोरियां होती है| हमें इस का
आभास भी नहीं होता कि प्रतिदिन हम कितनी
गलतियाँ करते हैं| हम अपनी गलतियों के लिए
क्षमायाचना करते हैं, लेकिन हम दूसरों को तुरंत माफ
नहीं करते और अपने साथियों की निंदा करते हैं|
प्रत्येक व्यक्ति अपने अच्छे और बुरे कार्यों के लिए
स्वयं उत्तरदायी है और किसी को भी दूसरे के
क्रियाकलापों में निर्णायक बनने का अधिकार नहीं है|

Thursday, July 29, 2010

कीर्ति राणा की कलम से...








अच्छा करने के लिए मुहूर्त की जरूरत नहीं

हमारे एक साथी तेज बारिश में मिठाई की दुकान से कुछ ज्यादा ही मिठाई ले रहे थे। मैंने पूछा क्या भारत बंद के कारण तैयारी कर रहे हो, पहले तो वे टाल गए,दो-तीन बार पूछने पर राज खोला कि श्रीमती का जन्मदिन है और हमने ऐसे किसी भी शुभ या स्मृति प्रसंग पर तय कर रखा है कि अपनी खुशियां उन बच्चोंके साथ भी बांटें जो बेसहारा, अनाथ हैं। बंद के कारण दुकानें नहीं खुलेंगी इसलिए एक दिन पहले ही खरीद कर रख रहा हूं।

एक अन्य मित्र भी जरूरतमंद की मदद करते हैं लेकिन, तरीका थोड़ा अलग है। पास-पड़ोस मे किसी निर्धन परिवार का बच्चा आर्थिक परेशानी के कारण आगे पढ़ाई नहीं कर पा रहा हो तो उसे कापी, किताब, फीस, स्कूली ड्रेस आदि मुहैया करा देते हैं। एक अन्य व्यक्ति अपने परिवार के बड़े छोटे सदस्यों के साफ-सुथरे और पहनने लायक कपड़े प्रेस करवा के जरूरतमंद लोगों या आश्रम में देकर आते हैं।

चाट की दुकान पर हम कुछ चटपटा खाने के लिए तो जाते हैं लेकिन टेस्ट पसंद नहीं आने पर हम बिना एक पल सोचे वह प्लेट डस्टबीन में डाल देते हैं। हमारे बच्चे पेस्ट्री की जिद करते हैं, हम लेकर भी देते हैं लेकिन बालहठ के चलते वह उसे फेंक कर कुछ और खाने के लिए मचलने लगते हैं। हम फिर उनकी नई फरमाइश पूरी करने में लग जाते हैं।

हम चाहें जिस धर्म का पालन करते हों, सभी धर्मों के पवित्र ग्रंथों में बात कहने के तरीके अलग हो सकते हैं लेकिन इन सभी का मूलभाव यह तो रहता ही है कि जो असहाय, असमर्थ हैं उनकी मदद करें। हम सब के मन में कभी-कभी सहायता का समुद्र हिलोरे भी मारने लगता हैं लेकिन समझ नहीं आता किसकी, कैसे, कितनी मदद करें। जब कि ऐसे लोगों कि कमी नहीं है जिन्हें समय पर मिली थोड़ी सी मदद भी डूबते को तिनके का सहारा साबित हो सकती है।

हम अपने पर, अपनों पर खर्च करने में तो दिखावे की सारी सीमाएं लांघ जाते हैं फिर भी कई बार वह सुकून नहीं मिलता जिसके लिए हम यह सारा प्रदर्शन करते हैं। रोते बच्चे को चुप कराने के लिए हम तमाम जतन करते हैं, तत्काल महंगा खिलौना खरीद कर उसे बहलाने की कोशिश भी करते हैं लेकिन उसकी रुलाई रुकती भी है तो कौवे-कबूतर को उड़ते, बंदर को उछलकूद करते, हमारी हंसती शक्ल देखकर या मां की गोद में प्यार की थपकी से। हमारा मन भी लगता है किसी ठुनकते बच्चे की तरह ही है कब, कैसे खुश होगा हमें ही पता नहीं होता। फिर भी हमें यह तो पता ही है कि किसी की आंख से बहते आंसू पोंछने के लिए हम रुमाल दे सकते हैं। हमें यह भी पता है कि किसी अन्य के चेहरे पर यदि हल्की सी मुस्कान देखना है तो हमें भी जोर से तो हंसना ही पड़ेगा। समस्या तो यह है कि हम हंसना मुस्कुराना भूलते जा रहे हैं। 

श्री रविशंकर जीवन जीने की कला के रहस्यों को समझाते हुए कहते हैं भले ही झूठमूठ हंसो, न हंस सको तो झूठे ही मुस्कुराओ, बदले में हमें सामने वाले की सच्ची या झूठी ही सही लेकिन मुस्कान ही मिलेगी। सही है नाराज कर हम दूसरों का दिल तोडऩे के साथ ही अपना खून भी जलाते हैं लेकिन हमारी हंसी दिलों को जोडऩे और हार्टअटैक से बचाव का काम भी कर सकती है। हम अपने गम से ही इतने दुखी हैं कि सामने वाले कि न तो खुशी पचा पाते हैं और न ही उसका दु:ख हमें विचलित करता है। 

'अपने लिए जिए तो क्या जिए, तू जी ऐ दिल जमाने के लिए' यह गीत सुनते वक्त हम गुनगुनाते जरूर हैं लेकिन इसका मर्म नहीं समझ पाते। कई बार भारी भरकम गिफ्ट पर हल्की सी मुस्कान भारी पड़ जाती हैं लेकिन हम बाकी लोगों के चेहरे की मुस्कान बढ़ाने वाले छोटे से प्रयास करने के विषय में भी नहीं सोच पाते। दूसरों के लिए हम करना तो बहुत कुछ चाहते हैं लेकिन प्रचार से दूर रहकर असहाय लोगों की सहायता करने वालों की हमारे ही आसपास भी कमी नहीं है, हम चाहें तो ऐसे लोगों सेभी कुछ अच्छा करना तो सीख ही सकते हैं।

साभार : पचमेल ब्लॉग 09816063636

Wednesday, July 21, 2010

कौन है ख़ूबसूरत ..?

  • ख़ूबसूरत बातें...
  • खूबसूरत है वो लब जिन पर दूसरों के लिए एक दुआ है

  • खूबसूरत है वो मुस्कान जो दूसरों की खुशी देख कर खिल जाए

  • खूबसूरत है वो दिल जो किसी के दुख मे शामिल हो जाए और किसी के प्यार के रंग मे रंग जाए

  • खूबसूरत है वो जज़बात जो दूसरो की भावनाओं को समझे

  • खूबसूरत है वो एहसास जिस मे प्यार की मिठास हो

  • खूबसूरत है वो बातें जिनमे शामिल हों दोस्ती और प्यार की किस्से कहानियाँ

  • खूबसूरत है वो आँखे जिनमे कितने खूबसूरत ख्वाब समा जाएँ

  • खूबसूरत है वो आसूँ जो किसी के ग़म मे बह जाएँ

  • खूबसूरत है वो हाथ जो किसी के लिए मुश्किल के वक्त सहारा बन जाए

  • खूबसूरत है वो कदम जो अमन और शान्ति का रास्ता तय कर जाएँ

  • खूबसूरत है वो सोच जिस मे पूरी दुनिया की भलाई का ख्याल आ  जाए

  • sandeep ke vichar Dula ram saharan ke orkut account se sabhaar

Sunday, July 18, 2010

सर्वोत्तम सुक्तियां

    • जो शत्रु बनाने से भय खाता है, उसे कभी सच्चे मित्र नहीं मिलेंगे। 
    • उनसे कभी मित्रता न कर, जो तुमसे बेहतर नहीं।                    
    • जीवन में एक मित्र मिल गया तो बहुत है, दो बहुत अधिक है, तीन तो मिल ही नहीं सकते।                                                                  
    • या तो हाथीवाले से मित्रता न करो, या फिर ऐसा मकान बनवाओ जहां उसका हाथी आकर खड़ा हो सके।                                                        
    • संसार में केवल मित्रता ही एक ऐसी चीज है जिसकी उपयोगिता के सम्बन्ध में दो मत नहीं है।                                                                      
    • न्याय नहीं बल्कि त्याग और केवल त्याग ही मित्रता का नियम है।                
    • प्रकृति जानवरों तक को अपने मित्र पहचानने की सूझ-बूझ दे देती है। 
    • ज्ञान मुक्त करता है, पर ज्ञान का अभिमान नरकों में ले जाता है।
    • सच्चा प्रेम दुर्लभ है, सच्ची मित्रता उससे भी दुर्लभ।                     
    • अच्छाई का अभिमान बुराई की जड़ है।
    • स्वार्थ और अभिमान का त्याग करने से साधुता आती है।
    • अपनी बुद्धि का अभिमान ही शास्त्रों की, सन्तों की बातों को अन्त: करण में टिकने नहीं देता।
    • वर्ण, आश्रम आदि की जो विशेषता है, वह दूसरों की सेवा करने के लिए है, अभिमान करने के लिए नहीं।
    • आप अपनी अच्छाई का जितना अभिमान करोगे, उतनी ही बुराई पैदा होगी। इसलिए अच्छे बनो, पर अच्छाई का अभिमान मत करो।

Tuesday, July 6, 2010

क्रांतिकारी मुनिश्री तरुणसागर : 
कड़वे प्रवचन

 किसी ने पूछा: गुरु क्यों जरूरी है? मैंने प्रति प्रश्र किया: मां क्यों जरूरी है? वे बोले- मां न हो तो हम संसार में नहीं आ सकते। मैंने कहा- गुरु न हो तो हम संसार से मुक्त नहीं हो सकते। गुरु का मतलब फैमिली डॉक्टर। गुरु मन की चिकित्सा करता है। शिष्य के लिए गुरु का द्वार किसी भी मंदिर या मस्जिद की चौखट से अधिक महत्वपूर्ण होता है। सागर तो बिना लहरों के हो सकता है, मगर लहरें बिना सागर के नहीं हो सकती। गुरु तो बिना शिष्य के हो सकता है, मगर शिष्य बिना गुरु के नहीं हो सकता।

दुनिया में जो बड़े पाप हो रहे हैं। उन्हें कौन कर रहा है? भूखे पेट का आदमी? नहीं। खाली पेट का आदमी तो पेट भरने जितना ही पाप करता है। लेकिन यह जो भरे पेट का आदमी है ना। वह पेटी और कोठी भरने जितने बड़े-बड़े पाप करता है। महावीर वाणी है- ईमानदारी से पेट भरा जा सकता है, पेटी और कोठी नहीं। समुद्र शुद्ध जल से कहां भरता है? तमाम गंदे नदी-नाले का जल जब समुद्र में गिरता है तब कहीं वह भरता है। याद रखना: आदमी पहले तो अमीर होने के लिए बड़े पाप करता है और फिर अमीर होकर अपनी अइयाशी पर पाप करता है। 

Sunday, June 27, 2010

जो नहीं मिला उसका ज्यादा दुख



जो नहीं मिला, उसका ज्यादा दुःख  / कीर्ति राणा


हम अपने घर की हालत तो सुधार नहीं पाते मगर दूसरों के अस्त-व्यस्त घरों को लेकर टीका टिप्पणी करने से नहीं चूकते। हमारा स्वभाव कुछ ऐसा हो गया है कि पड़ोसी का सुख तो हमसे देखा नहीं जाता। उसके दुख में ढाढस बंधाने के बदले सूई में नमक लगाकर उसके घावों को कुरेदने में हमेशा उतावले रहते हैं।

जब पुरानी संदूकों के ताले खोले जाते हैं तो सामान उथल-पुथल करते वक्त ढेर सारे नए खिलौने भी हाथ में आ जाते हैं। तब याद आती है कि घूमने गए थे तब ये तो बच्चों के लिए खरीदे थे। उन्हें खेलने के लिए सिर्फ इसलिए नहीं दिए कि एक बार में ही तोड़ डालेंंगे। अब खिलौने हाथ आए भी तो तब, जब उन बच्चों के भी बच्चे हो गए, और इन बच्चों के लिए लकड़ी और मिट्टी के खिलौने इस जमाने में किसी काम के नहीं हैं। उन्हें इससे भी कोई मतलब नहीं कि इन छोटे-छोटे खिलौनों में दादा-दादी का प्यार छुपा है।

अब हम इस बात से दुखी भी हों तो इन बच्चों क ो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनके लिए अपना सुख ज्यादा मायने रखता है। ऐसे में कई बुजुर्ग कलपते हुए प्रायश्चित भरे लहजे में स्वीकारते भी हैं कि उसी वक्त हमारे बच्चों को खेलने के लिए दे देते तो ज्यादा अच्छा रहता। ऐसा किया होता तो निश्चित ही उस वक्त बच्चों को खुशी मिलती पर उससे हमारा अभिभावक वाला गुरूर खत्म हो जाता, शायद इसीलिए संदूक में रखकर ताला लगाकर भूल गए।

हम सब लगभग इसी तरह के प्रसंगों का सामना करते ही हैं। हमारे बुजुर्गों की न तो ज्यादा आवश्यकताएं थीं और इससे भी महत्वपूर्ण यह कि वे हर हाल में खुश रहना और हालातों से समझौता करना जानते थे। अब ऐसा नहीं है, हमारे पास जो है उसे हम भोग नहीं पाते और जो हमेंं मिलना संभव नहीं उसे पाने के प्रयास में घनचक्कर हुए जाते हैं। पूरी जिंदगी मेें हममें से कई लोग तो यह तय ही नहीं कर पाते हैं कि उन्हें क्या करना है और इस दुनिया में उनक ी कुछ उपयोगिता भी है या नहीं। हम कभी संतुष्ट नहीं हो पाते। लिहाजा परिस्थितियों से समझौता करना नहीं समझ पाते। समझौता करना नहीं चाहते इसी कारण अपने ही हाथों अपने जीवन को असहज बना देते हैं। जो सुख हमें मिला है उसमें खुश होने की अपेक्षा हम इस चिंता में ही अपना खून जलाते रहते हैं कि सामने वाला सुखी क्यों नजर आ रहा है। दूसरे से जलन के मामले में यूं तो हम महिलाओं के स्वभाव का जिक्र तत्काल करने लगते हैं लेकिन पुरुष स्वभाव भी इस मामले में बिल्कुल महिलाओं जैसा ही है। हमें अपना पांच हजार का जूता और दस हजार का मोबाइल एक दिन बाद ही तब घटिया लगने लगता है जब हमारा पड़ोसी अपने जूते और मोबाइल का दाम हमसे ज्यादा बताता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी महिला ने भले ही दस हजार की साड़ी और पचास हजार का हार क्यों न पहन रखा हो, शादी समारोह में वह पड़ोस से गुजरी महिला के नेकलेस की फुसफुसाते हुए तारीफ इसी अंदाज में करेगी मेरे हार से उसका हार कितना अच्छा है न, मुझे भी ऐसा ही लेना था। बस कहते जरूर हैं कि हमे किसी से मतलब नहीं, अपने में मस्त रहते हैं, पर क्या वाकई हमारी कथनी और करनी में अंतर नहीँ है। हम तब ही अपने में मस्त रहते हैं जब सामने वाला मुसीबत में हो। उस वक्त हम चिंतित रहते भी हैं तो इसलिए कि कहीं वह दुखी आदमी आकर हमारे सामने अपना दुखड़ा न रोने लगे। सामने वाला रात-दिन मेहनत करके तरक्की कर भी ले तो हम उसकी यह तरक्की इसलिए नहीं पचा पाते क्योंकि उस मुकाम तक हम नहीं पहुंच पाए। हमें अपना काम तो सर्वश्रेष्ठ लगता है लेकिन दूसरे के काम में हम कमिया ही तलाशते रहतेे हैं।

हम अच्छा करना नहीं चाहते और कोई हमसे आगे निकल जाए यह हमें पसंद नहीं। हमारा बच्चा परीक्षा में अच्छे नंबरों से पिछड़ जाए तो पेपर कठिन होना, तबीयत खराब हो जाने जैसे बहानों की मदद लेने मेें जरा सी देर नहीं लगाते। उसी क्लास में पढऩे वाला पड़ोसी का बच्चा अच्छे नंबर ले आए तो हम कहने से नहीं चूकते स्कूल वालों से पहचान है। ले-देकर नंबर बढ़वा लिए होंगे। छोटी सी जिंदगी में हमें अपना घर व्यवस्थित करने की फुरसत तो मिल नहीं पाती, दूसरे के अस्तव्यस्त घर का बखान करने में ही हम वक्त जाया करते रहते हैं। हमारे पास लोगों की मदद करने के लिए भले ही टाइम नहीं हो लेकिन सूई में नमक लगाकर उनके जख्म कुरेदने का भरपूर वक्त हमारे पास है।



एज केयर के सुझाव पर आज से ही अमल
संस्था एज केयर के अध्यक्ष डा वीके शर्मा के अनुरोध पर आज से इस कालम का पाइंट साइज कुछ बड़ा किया जा रहा है। उनका सुझाव था कि इससे वरिष्ठ नागरिकों को पढऩे में अधिक आसानी हो जाएगी।

Sabhar : Pachmel by Kirti Rana, Shimla

Saturday, June 26, 2010

क्षमा दिवस


व्यक्तित्व का अद्भुत गुण है क्षमा 

क्षमा का जीवन में बहुत बड़ा महत्व है। यदि इंसान कोई गलती करे 
और उसके लिए माफी माँग ले तो सामने वाले का गुस्सा काफी हद तक
 दूर हो जाता है। जिस तरह क्षमा माँगना व्यक्तित्व का एक अच्छा गुण है
 उसी तरह किसी को क्षमा कर देना भी इंसान के व्यक्तित्व में चार चाँद
 लगाने का काम करता है। माफ करने वाले व्यक्ति की हर कोई तारीफ 
करता है और उसकी प्रसिद्धि दूर दूर तक फैल जाती है।

कवियों ने क्षमा को अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया है। 
'क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात, कहाँ रहीम हरि को
 घट्यो जो भृगु मारी लात' जैसी पंक्तियाँ यही संदेश देती हैं कि 
क्षमा करना बड़ों का दायित्व है। यदि छोटे गलती कर देते हैं 
तो इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें माफ न किया जाए।

वहीं रामधारी सिंह दिनकर ने कहा है कि क्षमा वीरों को 
ही सुहाती है। उन्होंने लिखा है ‘क्षमा शोभती उस भुजंग 
को जिसके पास गरल हो, उसका क्या जो दंतहीन विषहीन
 विनीत सरल हो।' वह लिखते हैं- 
सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है बल का दर्प चमकता 
उसके पीछे जब जगमग है।

क्षमा को सभी धर्मों और संप्रदायों में श्रेष्ठ गुण करार दिया गया है। 
जैन संप्रदाय में इसके लिए एक विशेष दिन का आयोजन किया 
जाता है। मनोविज्ञानी भी क्षमा या माफी को मानव व्यवहार का 
एक अहम हिस्सा मानते हैं। 

उनका कहना है कि यह इंसान की जिन्दगी का एक अत्यंत 
महत्वपूर्ण पहलू है। क्षमा का मनुष्य के व्यक्तित्व में बहुत 
महत्व होता है। यदि आदमी गलती कर दे और उसके लिए 
माफी नहीं माँगे तो इसका मतलब यह हुआ कि उसके 
व्यक्तित्व में अहम संबंधी विकार है। 

माफी माँगना और माफ करना दोनों ही इंसानी व्यक्तित्व 
को परिपूर्ण करने वाले तत्व हैं। लेकिन कुछ लोग जो 
जानबूझकर, बार-बार लगातार और मूर्खतावश या 
अहंकारवश गलती करते हैं, उन्हें कभी माफ नहीं करना
 चाहिए। आज के जमाने में माफ करने वाला बेवकूफ 
समझा जाता है। अगर कोई आपके व्यक्तित्व को बार-बार 
अपमानित करने की कोशिश करें तो समय यह कहता है 
कि ऐसे व्यक्ति का त्याग करना ही मुनासिब है।

Sabhar : balmuskan

असफलता अंत नहीं





अपने आप से समझौता न करें 

अच्छा जॉब पाना और उसके लिए लगातार मेहनत करना किसी प्रतियोगी
परीक्षा के लिए वह भी पूर्ण लगन के साथ। आपने लगन के साथ मेहनत
की है पर परिणाम नकारात्मक आ रहा है। आप क्या करेंगे? मेहनत
करना छोड़ देंगे या अपना लक्ष्य बदल देंगे? यह स्थिति प्रत्येक युवा
 के सामने आती है। सफलता प्राप्ति का दबाव एक असफलता के बाद जरा
 ज्यादा ही हो जाता है। व्यक्ति स्वयं से प्रश्न पूछने लगता है कि आखिर
कहाँ गड़बड़ हो गई? 

दरअसल व्यक्ति कई बार इस प्रकार की स्थिति होने पर पलायनवादी
मानसिकता अपना लेता है। वह असफलता से इतना डर जाता है कि
पुन: उस रास्ते पर जाने की वह हिम्मत नहीं जुटा पाता। वह अपने
आप से समझौता करने लगता है कि शायद पेपर ही कठिन था या
 जॉब इंटरव्यू में उससे ज्यादा काबिल लोग आए थे। इतनी मेहनत
 करना मेरे बस की बात नहीं आदि। वह अपने आपको ही तर्क देने
लगता है और मेहनत से जी चुराने के लिए प्रेरित करने लगता है।
 जबकि यही समय होता है आत्मविश्लेषण करने का, अपनी कमियों
को स्वयं के सामने रखने का और सफलता से पुन: प्रेम करने का। 




* असफलता अंत नहीं 

परीक्षा या जॉब न पाने की असफलता का मतलब अंत नहीं है।
असफलता का मतलब होता है कि बस अब आप सफलता के
 लिए तैयार हो रहे हैं। रोजाना की जिंदगी में हमें कई ऐसे
लोग मिलते हैं जिन्होंने आरंभिक रूप से असफलता पाई परंतु
समय के साथ उन्होंने तर्कों की कसौटी पर सफलता को ऊँचा
ही रखा और पुन: अपने आपको प्रेरित कर मेहनत करने
लगते हैं। वे असफलता को अपने आप पर हावी नहीं होने देते। 

* एक ही लक्ष्य 
असफलताओं से होता हुआ रास्ता ही सफलता के नजदीक
पहुँचाता है। असफलता आपको बताती है कि कहाँ गड़बड़
हो गई और अगले प्रयास में कहाँ ज्यादा मेहनत करना है।
इससे आपको अपने लक्ष्य की प्राप्ति में काफी आसानी
हो जाती है। क्योंकि लक्ष्य और भी सटीक और सामने
नजर आने लगता है ऐसा लक्ष्य जो पहले से ज्यादा नजदीक है।

लक्ष्य की निकटता आपको ‍और ‍अधिक मेहनत करने के
लिए प्रेरित करती है। 

* असफलता भी सभी के साथ बाँटें
अक्सर हम असफलता को दुनिया से छिपाते हैं। इसके परिणाम
 काफी घातक सिद्ध होते हैं। जब सफलता को हम सभी को बताना
चाहते हैं तब असफलता को छुपाने से हम स्वयं ही ऐसे विचारों
के द्वंद्व में खो जाते हैं जहाँ से केवल असफलता ही नजर आने
लगती है। असफलता मिलने का मतलब है कि आपने प्रयास
किया और क्या प्रयास करने को भी आप दुनिया के सामने
नहीं लाना चाहेंगे। 

असफलता को अपने दोस्तों और परिवार वालों के साथ बाँटें,
हो सकता है कि आपको वे ऐसी राय दें जिसके बारे में आपने
कभी कल्पना ही न की हो। इससे मन भी नकारात्मक
विचारों से हल्का हो जाएगा जिससे ताजे और सकारात्मक
विचारों के लिए आपके मन में जगह बन पाएगी और आप
पुन: सफलता के लिए अपने प्रयास तेज कर देंगे।

sabhar : balmuskan

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